राष्ट्रीय संघ कश्मीर में आग से खेल रहा है : फ़ारूख़ अब्दुल्लाह

जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख और सांसद डॉक्टर फ़ारूख़ अब्दुल्लाह ने बीबीसी के साथ कश्मीर के मौजूदा हालात, भारत और पाकिस्तान की सियासत और धारा 35 ए पर बात की.

 
पढ़िए उनसे की गई बातचीत के कुछ अहम अंश.

डॉ साहिब आजकल आप क्या कर रहे हैं?
आपको मालूम है कि आजकल हालात बहुत नाज़ुक हैं. ख़ासकर कश्मीर के अंदरूनी स्वराज पर हमला किया जा रहा है. हिंदुस्तान की एक ख़ास जमात, जिसे आरएसएस कहते हैं, वो चाहती है कि कश्मीर का जो इलहाक़ है, जिन बुनियादों पर किया गया था, वह हटाया जाए.

उनका हमला धारा 370 और धारा 35ए पर है, इनको ख़त्म करने का उन्होंने अज़्म किया है. ये आज नहीं पहले से ही है, मगर आज उनकी सरकार है केंद्र में, वो समझते हैं कि इसको इस्तेमाल करके वह ये करेंगे.

वो आरएसएस के लोग हैं. ये दिल्ली में एक संगठन है, जो ये कर रहा है. ये नहीं जानते हैं कि वो आग से खेल रहे हैं. जो कुछ भी वह कर रहे हैं, उससे उनकी बर्बादी होने वाली है.
एकज़माने में आप बीजेपी के हिस्सा रहे थे.
मैं कभी भी बीजेपी का हिस्सा नहीं रहा हूं.

एनडीए का हिस्सा रहे हैं आप. कैसा तज़ुर्बा रहा आपका बीजेपी के साथ?
उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी थे, वह बहुत मुख़्तलिफ़ इंसान थे. वो जानते थे कि कश्मीर को अगर साथ रखना है तो सबको साथ ले कर चलना होगा. वो जानते थे कि कोई ऐसी चीज़ नहीं करनी है जिससे जम्मू-कश्मीर की जनता को ये लगे कि उनके ऊपर कोई हमला किया जा रहा है.
इसलिए उन्होंने कभी भी धारा 370 का मामला नहीं उठाया, 35ए का मामला भी नहीं उठाया, बल्कि सिर्फ़ विकास की बात की. उन्होंने ये भी कोशिश की कि पाकिस्तान से बात हो सके. वो बस लेकर यहां से लाहौर गए और दोस्ती की कोशिश की.

लेकिन कश्मीर का मसला फिर भी सुलझा नहीं है?
बदक़िस्मती से जब वो चुनाव हार गए तो वो जो एक मुहिम चली थी वो रुक गई. उनके बाद मनमोहन सिंह ने भी उस मुहिम को आगे चलाने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ उनकी जमात के लोगों ने भी उनका भरपूर साथ नहीं दिया कि वो उस मुहिम को आगे ले जा सकते.
पाकिस्तान में भी एक मुसीबत आ गई थी कि जनरल मुशर्रफ़ को कोर्ट का सामना करना पड़ा. उसमें वो हार गए और जो एक आगे उठाया हुआ क़दम था वो आगे नहीं बढ़ सका.

भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में आपको कैसा लीडर नज़र आ रहा है?
वो हिंदुस्तान के लीडर हैं इसमें कोई शक़ नहीं. लोगों ने उन्हें बहुमत दिया है. हर लीडर के अंदर कमज़ोरियां भी होती हैं और अच्छाइयां भी.
अब आप देखिए उन्होंने लाल क़िले से कहा कि कश्मीरियों को दिल से गले लगाइए, उनसे बोली से बात करिए गोली से नहीं, ये अच्छी बात है. मगर आगे इस पर अमल होगा या नहीं होगा ये बात देखने की है. तब हमें दिखेगा कि उनकी लीडरशिप में वह दम है.
जिस तरह से आज हमारे वतन में फ़िरक़ापरस्ती का आलम बढ़ रहा है, वह गोरक्षा हो या दूसरी चीज़ें हो, जिसको हम देख रहे हैं. ये ख़तरे की घंटी है.
अब उन्होंने बहुत ज़ोर से इसके बारे में बोला है. अब हम देखेंगे कि क्या वो हिम्मत रखते हैं और ये कि क्या वो इस देश को बचा सकेंगे?

लेकिन कश्मीर के लोग कह रहे हैं कि आज तक ऐसे कई बयान सामने आए हैं.
बिलकुल सही है. इसमें कोई दो राय नहीं है. इसीलिए लोगों के मन में शक़ है कि क्या ये सिर्फ़ सियासी बयानबाज़ी है या फिर वो इस पर अमल करना चाहते हैं. ये तो समय बताएगा.

कश्मीर की जनता को ही क्या सारे हिंदुस्तान की जनता को भी पता लगेगा. हिंदुस्तान में 20-22 करोड़ मुसलमान भी रहते हैं, सिख रहते हैं, बौद्ध रहते हैं, जैन और दूसरे धर्मों के लोग भी रहते हैं. क्या उनसे भी बराबरी का सलूक होगा?
क्या ये वतन उस तरफ़ चलेगा, जिसके लिए इस वतन की लड़ाई लड़ी गई थी?
पार्लियामेंट में अभी याद किया गया 70 साल पहले जब देश की आज़ादी की जंग हुई थी, वहां किसी मुसलमान का नाम आपने सुना?
ये भी याद रखें कि मुसलमान आगे-आगे उस लड़ाई में था जो हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए थी. इस बात को मीडिया नज़रअंदाज़ कर रहा है.

भारत की मौजूदा लीडरशिप इसके लिए कितनी ज़िम्मेदार है?
मैं समझता हूं सब ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने कभी नाम नहीं लिया उनका. 70 साल हो गए, क्या उन्होंने इनमें से किसी का नाम लिया.
उन्होंने कभी ये बोला कि मुसलमानों का योगदान क्या है? अगर उन्होंने बोला होता तो आज देश की ये हालत नहीं होती.

आपकी जमात पिछले साल छह महीनों तक चलने वाले प्रदर्शनों में मारे गए प्रदर्शनकारियों पर शोर मचा रही है,लेकिन 2010 में भी 120 प्रदर्शनकारी मारे गए, उस समय आपकी सरकार थी, आप लोगों ने क्या किया उस समय?
क्या करते? किसने करवाया, उनसे पूछें?
सरकार तो आपकी पार्टी की थी.
मुझे बताएं क्या उससे पाकिस्तान बना था? तब्दीलियां आई थीं? क्या उससे यहां पाकिस्तान बन जाता और आज़ादी आ जाती?
ये उन हुर्रियत के नेताओं से पूछिए जिन्होंने इन बच्चों को क़ुर्बान करवाया. क्या मिला?
अब लोगों को पता चलेगा, इन नेताओं की जायदादें और पैसा कहां से आया, उसका इस्तेमाल कैसे हुआ. जम्मू-कश्मीर की ही नहीं पूरी दुनिया की आवाम को पता चलेगा कि इन्होंने वो पैसा कैसे इस्तेमाल किया.
इतना ही नहीं, जब चार-ए-शरीफ़ जलाया गया सैयद अली शाह गिलानी ने उस समय तीन करोड़ का चंदा जमा किया था, मेरा सवाल है कि तीन करोड़ कहां गए?

सरकार आपकी पार्टी की थी. इतने बच्चे मारे गए, आपके सभी सदस्यों ने इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया?
वो इस्तीफ़ा क्यों देते? वो मारें और हम इस्तीफ़ा दें.
किसी को तो सज़ा नहीं मिली जो उसमें शामिलथे?
सज़ा मिलेगी इंशाल्लाह. कोई परवाह नहीं, यहां तो हज़ारों साल गुज़र जाते हैं.

आपके बारे में आमतौर पर कहा जाता हैकि आप जब सत्ता में होते हैं कि कुछ और बताते हैं और बाहर होते हैं तो कुछ औरबताते हैं?
ये आप पत्रकारों की मेहरबानी है. फ़ारूख़ अब्दुल्लाह दिल्ली में भी वही बात करता है और कश्मीर में भी वही बात करता है. मैं इससे कभी हटा नहीं, और कभी नहीं कहा कि हम पाकिस्तान का हिस्सा हैं.
आजकल तो आप पाकिस्तान से बातचीत करने की बात करते हैं. एक बार आपने पाकिस्तान पर बम गिराने की बात की थी.
क्यों न गिराओ? मैं उनमें से नहीं हूँ जो क़दम पीछे उठाएगा.
मेरी माओं के साथ ज़ुल्म हो, मेरा बहनों के साथ बलात्कार हो, तो मैं चुप रहूं? कश्मीरियों को क्या मिला? अफ़्सपा और फौज. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो ये मुसीबतें ना होतीं.

क्याकश्मीर के पत्थरबाज़ों को आम लोगों से माफ़ी मिलनी चाहिए?
देखिए, मैं जब मुख्यमंत्री था उस समय 70 बच्चे थे जिन पर चरमपंथ से जुड़े सख्त मामले थे. अगर आप जगमोहन की किताब पढ़ें तो उसमें उसका ज़िक्र है. उन्होंने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया था.
वो कश्मीरी बच्चे हैं. अगर हम उनको मुख्यधारा में नहीं लाएंगे, तो कहां फेंकेंगे. इन बच्चों को छोड़ देना चाहिए. मैं यहां और केंद्र सरकार से भी यहीं कहूंगा कि इनको छोड़ देना चाहिए.
जैसे उन्होंने (मोदी ने) ख़ुद फ़रमाया है “गोली से नहीं बोली से” उसमें ये भी तो आ सकता है. इन कश्मीरियों को भी दिल से लगाना है.

बहुत दिनों से कश्मीर में कथित इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा के पैर पसारने की बातें हो रही हैं, इसको आप कैसे देखते हैं?
ये केंद्र सरकार को डराने के लिए किया जा रहा है. मेरे समय में भी पाकिस्तान के झंडे खड़े किए जाते थे, क्या पाकिस्तान बन गया?

अगर एक बेटा बंदूक उठाता हैतो एक माँ-बाप की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है? अगर आपके बेटे के हाथ में बंदूक हो तो आप क्या करेंगे?
माँ-बाप करेगा क्या? बेटे ने तो बगावत कर ली. बेटा बाप को कहता है चुप करो, अब मुझे ही कुछ करने दो. ये उसका नज़रिया है.

अगर आपकी पार्टी की सरकार आईतो आपकी पहली प्राथमिकता क्या होगी?
पहली प्राथमिकता वही होगी कि केंद्र यहां कश्मीर में सबके साथ बातचीत करे, पाकिस्तान के साथ भी बात करे. कश्मीर का मसला धार्मिक मसला नहीं है.
आजकल हमारे हिंदुस्तान के पत्रकार और आरएसएस ये बयान कर रहे हैं कि ये इस्लामी लड़ाई है. लेकिन ऐसा नहीं है, ये एक सियासी लड़ाई है. कश्मीर की समस्या हल होने के बाद यहां शांति होगी.

अगर आप सरकार में आते हैं, तो क्या 2010 और 2016 में जो प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों की कारवाई में मारे गए, उनको सज़ा मिलेगी?
अफ़्स्पा किसने लाया? हमने तो अफ़्स्पा लाया नहीं. अफ़्स्पा तो इनको इजाज़त देता है कि किसी भी घर में घुस सकते हैं, तलाशी कर सकते हैं, गोली मार सकते हैं.

आजकल की दुनिया में इंसाफ़ का क़ानून है? अगर आप बेगुनाह को मारते हैं तो आपको मौत की सज़ा होनी चाहिए. हम इनके गुलाम नहीं हैं, हम हिस्सेदार हैं. इनके दिमाग़ से ये बात निकालिए.

आप दिल्ली वालों की बात कर रहे हैं?
और क्या? अगर वो समझते हैं की हम उनके ग़ुलाम हैं तो वह ख़रीद सकते हैं ग़ुलाम. यहां कई ग़ुलाम ख़रीदे गए हैं, उनकी कमी नहीं है.

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