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राजनीति 

आज से नहीं कांग्रेस पर 1966 से है गोहत्या का पाप!

केरल में खुलेआम गाय के बछड़े को काटकर खाने के बाद कांग्रेस पार्टी और उससे जुड़े लोग चौतरफा हमले में है। कांग्रेस पार्टी को समर्थन देने वाले कई कथित हिंदू साधु-संत इस मामले पर अब तक चुप्पी साधे हुए हैं। खास तौर पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने गाय काटने के मामले पर अब तक कुछ नहीं बोला है। इससे नाराज लोग सोशल मीडिया के जरिए अपना गुस्सा जता रहे हैं। कई लोग मांग कर रहे हैं कि इस घटना के बाद पूरे हिंदू समाज को कांग्रेस पार्टी और इससे जुड़े लोगों का बायकॉट करना चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस पार्टी शुरुआत से ही हिंदू धर्म की आस्था से जुड़े इस विषय पर खिलवाड़ करती रही है। 1966 में इंदिरा गांधी ने गोहत्या पर पाबंदी की मांग कर रहे साधु-संतों पर गोली चलवाई थी, जिसमें ढाई सौ से ज्यादा साधुओं की जान गई थी। इसी के बाद इंदिरा गांधी ने देश भर में गाय काटने की अघोषित छूट दे दी थी।

साधुओं पर इंदिरा की बर्बरता

1966 में 7 नवंबर के दिन दिल्ली के बोट क्लब पर गोहत्या पर पाबंदी की मांग कर रहे सैकड़ों साधु-संतों पर इंदिरा गांधी ने गोली चलाने का आदेश दिया था। 1966 के चुनाव में इंदिरा के लिए जीतना बहुत मुश्किल था। लेकिन उन्होंने दांव चला और वादा किया कि चुनाव जीतकर वो गोहत्या पर पाबंदी लगा देंगी और अंग्रेजों के जमाने से चल रहे कत्लखाने बंद करवाए जाएंगे। लेकिन चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गांधी इस वादे से मुकर गईं। जब साधु-संत गोहत्या पर पाबंदी के वादे की याद दिलाने दिल्ली पहुंचे तो इंदिरा ने उन पर पुलिस से गोलियां चलवाईं। इस गोलीबारी में 250 के करीब साधुओं की जान गई थी। ये गोपाष्टमी का दिन था। गोलीबारी के बाद रात के अंधेरे में मरे और कुछ अधमरे संतों और गोभक्तों को बड़ी बेरहमी से ट्रकों में लादकर दिल्ली से बाहर रिज़ पर ले जाया गया और बिना देखे कि उनमें कुछ जीवित हैं, उन पर पेट्रोल डालकर जला दिया गया। इस घटना के विरोध में शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ, स्वामी करपात्री और महात्मा रामंद्र वीर ने कई दिन तक उपवास भी किया था, लेकिन इंदिरा गांधी सरकार टस से मस नहीं हुई।

गोहत्या के श्राप से मरीं इंदिरा

शायद आपको यकीन न हो, लेकिन यह बात सच मालूम होती है। दरअसल फायरिंग में बड़ी संख्या में साधु-संतों की मौत के बाद धर्मगुरु स्वामी करपात्री ने इंदिरा गांधी को श्राप दिया था कि “जिस तरह से तुमने साधु-संतों पर गोली चलवाई है, ठीक इसी तरह से एक दिन तुम भी मारी जाओगी।” उनका यह श्राप उस वक्त के अखबारों में छपा भी था। इसके बाद इंदिरा गांधी की सत्ता हमेशा डोलती ही रही। 31 अक्टूबर 1984 को जब उनकी हत्या हुई तो उस दिन भी गोपाष्टमी का ही दिन था। इसे इत्तेफाक कहें या स्वामी करपात्री का श्राप कि इंदिरा गांधी को ठीक उसी तरह से उनके घर में घेरकर गोलियों से भूना गया, जैसे उन्होंने साधुओं की हत्या करवाई थी। गोपाष्टमी के दिन गायों की पूजा की जाती है।

गोवध को नेहरू का समर्थन

आजादी के बाद गोवध एक बड़ा मुद्दा हुआ करता था। कांग्रेस पार्टी के सांसद सेठ गोविंद दास ने 1952 में लोकसभा में एक निजी विधेयक रखा, जिसमें दूध देने वाली गायों के कत्ल पर पाबंदी की बात कही गई। इस विधेयक पर 1955 तक चर्चा होती रही थी। विनोबा भावे भी इस बिल को समर्थन दे रहे थे। बिल में प्रस्ताव रखा गया था कि वन विभाग की जमीनों पर इंतजाम किया जाए जहां पर गायें आराम से रह सकें। 2 अप्रैल 1955 के दिन बिल पर वोटिंग के वक्त तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ये कहते हुए इसका विरोध किया कि “अगर यह विधेयक पास किया गया तो मैं अपने पद से इस्त्तीफा दे दूंगा।” उस वक्त के खाद्य मंत्री रफी अहमद किदवई भी इस बिल के पक्ष में थे और गाय काटने पर पाबंदी चाहते थे।

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